रविवार, 8 अगस्त 2021

आपदा झेल चुके रैंणी गांव के कहीं और पुनर्वास की आवश्यकता : विशेषज्ञ

देहरादून, आठ अगस्त (भाषा) इस साल फरवरी में आई बाढ़ की खौफनाक यादों से अब तक उबर नहीं पाए चमोली जिले के रैंणी गांव के निवासियों को अब भविष्य की चिंता सता रही है कि अगर एक और त्रासदी आ गई तो उनका क्या होगा ?

'चिपको आंदोलन' की जन्म स्थली के रूप में विख्यात रैंणी गांव में ऋषिगंगा नदी पर बनी एक पनबिजली परियोजना सात फरवरी को आई आपदा में पूरी तरह तबाह हो गयी थी जबकि पांच ग्रामीणों को भी इसमें अपनी जान गंवानी पड़ी थी।

क्षेत्र में एक और आपदा आने की आशंका का ग्रामीणों का डर बेबुनियाद नहीं है और रैंणी में फरवरी में आई बाढ़ के प्रभाव का अध्ययन करने वाले एक विशेषज्ञ दल ने प्राकृतिक आपदाओं के प्रति इसकी बढ़ती संवेदनशीलता को देखते हुए हाल में इस गांव को जल्द से जल्द से विस्थापित किए जाने की संस्तुति की है ।

उत्तराखंड में आपदा प्रभावित गांवों का विस्थापन और पुनर्वास कोई नई बात नहीं है जहां बार—बार आने वाली प्राकृतिक त्रा सदियों से प्रभावित करीब 330 गांव अब भी नई जगह बसाए जाने की प्रतीक्षा में हैं।

प्रभावित गांव में अध्ययन के आधार पर दी अपनी रिपोर्ट में भू-सर्वेक्षण विशेषज्ञों ने कहा है कि रैंणी वर्तमान में संवेदनशील है और वहां ढलान को गिरने से रोकने के लिए पर्याप्त स्थिरीकरण कार्य करने की जरूरत है। उनका मानना है कि अगर उचित उपाय नहीं किए गए तो नदियों द्वारा भूक्षरण हो सकता है ।

‘उत्तराखंड डिजास्टर रिकवरी इनीशिएटिव’ (यूडीआरपी) के तहत संचालित इस रिपोर्ट में कहा गया है कि ऋषिगंगा और धौलीगंगा के संगम पर स्थित रैंणी गांव के ढलानों का उपचार किया जाना चाहिए या पूरे गांव को जल्द से जल्द वहां से कहीं और पुनर्वासित कर दिया जाना चाहिए ।

जिला प्रशासन को पहले ही सौंपी जा चुकी इस रिपोर्ट के अनुसार, क्षेत्र के दौरे के दौरान यह पाया गया कि लगातार बारिश के कारण ढलानों की मिटटी बहुत तर हो चुकी है और इस कारण यहां बहुत से 'स्लिप' क्षेत्र बन चुके हैं ।

रैंणी गांव के प्रधान भवान राणा ने कहा कि दो माह पहले गांव से ठीक 10 मीटर नीचे जोशीमठ—मलारी सड़क का 40 मीटर हिस्सा धंसने से यहां आपदा आने की आशंका का डर ग्रामीणों में और गहरा गया है ।

उन्होंने बताया कि सीमा सड़क संगठन ने हालांकि सड़क के इस हिस्से की मरम्मत कर दी लेकिन भारी बारिश के बाद इस पर फिर से दरारें आ गयी हैं। उन्होंने कहा कि रैंणी गांव के निवासी सुरक्षित स्थान पर भेजे जाने का इंतचार कर रहे हैं। विशेषज्ञ टीम ने धाक और सुभाई गांवों को उनके विस्थापन के लिए उचित जगह बताया है।

राणा ने बताया कि इस रिपोर्ट को कार्रवाई के लिए देहरादून में अधिकारियों को भेज दिया गया है । उन्होंने बताया कि अभी तक इस संबंध में कुछ नहीं किया गया है । ग्राम प्रधान ने कहा कि अभी गांव में 30 परिवारों में करीब 122 लोग रह रहे हैं। उन्होंने कहा, “कुछ लोग शहरों में काम करने वाले अपने बच्चों के पास चले गए हैं जबकि जिनके पास कोई विकल्प नहीं है वे लोग यहीं रहने को मजबूर हैं।”

देहरादून में हालांकि ज्यादातर आपदा प्रबंधन अधिकारियों को इस रिपोर्ट के बारे में पता नहीं है। आपदा न्यूनीकरण और प्रबंधन केंद्र के अधिशासी निदेशक पीयूष रौतेला ने कहा कि उन्हें रिपोर्ट के बारे में पता नहीं है जबकि आपदा प्रबंधन सचिव एसए मुरूगेशन ने कहा कि यह रिपोर्ट उनके पास अभी नहीं पहुंची है।

मुरूगेशन ने कहा, “रिपोर्ट के मिलने और उसके अध्ययन के बाद ही रैंणी के बारे में कुछ किया जा सकता है।”

रैंणी प्रदेश भर में आपदा प्रभावित 400 गांवों में से एक है जिनका विस्थापन और पुनर्वास किया जाना है। उन्होंने दावा किया कि इनमें से 70 गांवों का विस्थापन किया जा चुका है जबकि बाकी का प्राथमिकता के क्रम से किया जाएगा।



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