उत्तरकाशी वरुणावत पर्वत की छांव में बसे उत्तरकाशी में इन दिनों एक अनोखी मुहिम चल रही है। यहां ढहते पहाड़ों को एक खास बम के जरिए उनकी खोई रौनक लौटाने की कोशिशें जारी हैं। एक ऐसा बम, जिसके फटने पर तबाही नहीं बल्कि हरियाली आती है। देहरादून से करीब 150 किमी दूर इस शहर के सफर के दौरान हो सकता है कि आपको ऐसे लोग दिख जाएं, जो सड़कों-पगडंडियों से घाटी में यह खास बम फेंकते रहे हों। इसका नाम है ‘बीज बम’। मिट्टी और जैविक खाद की तह में लिपटा बीज जब कहीं गिरता है, तो कुछ ही दिनों में उससे जीवन के अंकुर फूटने लगते हैं। पढ़ें: समाजसेवी द्वारका सेमवाल ने मुख्य शहर से 50 किमी दूर एक छोटे-से गांव कमद में यह प्रयोग किया था। कुछ असर दिखा तो उन्होंने स्कूलों में बातकर बच्चों और अन्य लोगों को जोड़ा। तरीका काम कर गया। इन तीन वर्षों में स्थानीय नेताओं-अफसरों से लेकर सीएम और राज्यपाल तक फोड़ चुके हैं। द्वारका लोगों को मौसमी फल, सब्जियों और दूसरी पहाड़ी वनस्पतियों के बीज मुहैया कराते हैं। उनका कहना है कि अगर 10 में से एक बम भी अपना असर दिखा गया तो इसे सौ फीसदी सफलता कहा जाएगा। आपदाओं से लड़ती उत्तरकाशी उत्तरकाशी नाम में इस जिले का इतिहास-भूगोल छिपा है। कहते हैं कि यह वास्तविक काशी यानी यूपी के वाराणसी की प्रतिकृति है। वाराणसी की तरह यह भी दो नदियों, वरुणा और असि के बीच बसा है। शहर के बीच में काशी विश्वनाथ हैं और भागीरथी किनारे मणिकर्णिका घाट। हालांकि पर्यटन के लिहाज से महत्वपूर्ण इस शहर को समय-समय पर प्राकृतिक आपदाओं की मार झेलनी पड़ी है। 2003 में तो इस पर वाकई पहाड़ ही टूट पड़ा। मुख्य शहर जिस पर्वत की तलहटी में बसा है, उसका एक हिस्सा बाजार पर आ गिरा था। फिर 2013 में जब केदारनाथ में आपदा आई, तब इस गंगा घाटी में भी भारी बारिश ने खूब तबाही मचाई थी। इस साल यमुना की सहायक नदी टोंस उफान पर है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इन तबाहियों का कारण पहाड़ों और जंगलों से छेड़छाड़ है। कई इलाकों में पहाड़ बिल्कुल नंगे दिखाई देते हैं। वन बढ़ेंगे तो आपदाएं घटेंगी।
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