शनिवार, 13 जून 2020

घास के मैदान बचाने के लिए उत्तराखंड ने निकाला कमाल आइडिया, बरकरार रहेगी खूबसूरती

देहरादून/उत्तरकाशी उत्तराखंड में घास के मैदानों (Meadows) और प्रकृति को बचाने के लिए ठोस शुरुआत हो गई है। राज्य का वन विभाग इस तरह की अनोखी पहल कर रहा है, जिसमें ईको फ्रेंडली इंजिनियरिंग की मदद से () में मिट्टी के कटाव से तबाह हो रहे घास के मैदानों और जंगलों को बचाने की कोशिश हो रही है। इसके लिए बाकायदा मिट्टी और घास के पैच लगाए जा रहे हैं और घास का बेहतर रखरखाव करके उसके सुरक्षित बनाया जा रहा है। उत्तराखंड के प्रिंसिपल चीफ कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट और फॉरेस्ट फोर्स के मुखिया जयराज ने हमारे सहयोगी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया, 'उत्तरकाशी जिले के दयारा बुग्याल में संरक्षण का काम पिछले साल ही शुरू हो गया। जल्द ही राज्य के सभी घास के मैदानों को बचाने के काम होगा। इस काम में लगभग छह करोड़ रुपये का खर्च भी आना है।' बताया गया कि दयारा बुग्याल में शुरू हुए काम का पहला चरण पूरा भी होने वाला है। टूरिजम सेंटर है दयारा बुग्याल 11 हजार फीट की ऊंचाई पर मौजूद दयारा बुग्याल के मैदान पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र हैं लेकिन भूक्षरण से प्रकृति को हो रहा नुकसान इसे सीमित कर रहा है। 28 वर्ग किलोमीटर में फैले इन मैदानों में दुर्लभ प्रजाति के जटामांसी (Spikenard) और कुटकी (Picrorhiza kurroa) के पौधे पाए जाते हैं, जिनका इस्तेमाल दवाएं बनाने में होता है। पिछले कुछ सालों में 2.5 किलोमीटर का मैदान खराब हुआ है और 600 मीटर के एरिया में कई क्रैक्स आ गए हैं। कोयर बोर्ड ऑफ इंडिया के असिस्टैंट मैनेजर सुशील भट्ट बताते हैं, 'पहले फेस में कोकोनट फाइबर के बने Coit mats (नारियल की रस्सी वाली चटाइयां) बिछाई जा रही हैं। ये खाद का काम तो करती ही हैं, मिट्टी बहने से भी रोकती हैं। ये मिट्टी को जकड़ लेती हैं, जिससे तेज बारिश में भी वह बहने नहीं पाती। ये चटाइयां कम से कम दो साल तक कारगर रहती हैं।' अलग-अलग तरीकों से मैदान बचाने की कोशिश इन्हीं मैट्स में देवदार की पत्तियां मिलाकर इनका इस्तेमाल चेक डैम के रूप में किया जा रहा है, जिससे मॉनसून के समय मिट्टी के कटाव को कम किया जा सके। अगले चरण में यही काम करने के साथ-साथ नर्सरी भी तैयारी की जाएंगी, जिसमें स्थानीय पौधों के साथ-साथ घास भी लगाई जाएगी।


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