पिथौरागढ़ उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में आने वाले जिस कालापानी इलाके पर नेपाल ने अपना दावा किया है, उसके अंतर्गत सिर्फ तीन गांव आते हैं। ऊपरी हिमालय पर स्थित इस इलाके के लोगों का जीवन काफी संघर्षों से भरा है। दुर्लभ जड़ी-बूटियों वाले इस इलाके के लोग मौसम की चरम स्थिति का सामना करने के अलावा कई तरह की चुनौतियों को झेलते हुए जीवन यापन करते हैं। बीते सालों में पिथौरागढ़ में पड़ने वाले इस इलाके को सरकारी योजना के तहत होमस्टे में बदल दिया गया था। कालापानी क्षेत्र में पड़ने वाले तीन गांव गंजी, नाबी और कुटी फिलहाल सैलानियों के लिए एक महत्वपूर्ण डेस्टिनेशन के लिए मशहूर हैं। ट्रेकर्स के अलावा कैलाश तीर्थयात्रियों के लिए भी यह इलाका खासतौर पर जाना जाता है। हालांकि, सर्दियों में इलाके के व्यापार पर मौसम पूरी तरह से रोक लगा देता है। इस दौरान यहां तापमान 20 डिग्री सेल्सियस से भी नीचे चला जाता है। भारी बर्फबारी होने के चलते यहां जीवन और मुश्किल हो जाता है। इलाके में रहने वाली घूमंतू आदिवासी जनजाति इस दौरान निचले इलाकों की ओर धारचूला कस्बे में चली जाती है। नाबी के रहने वाले सनम नाबियाल ने बताया, 'हम गांव में 6 से 7 महीने के लिए रुकते हैं। उसके बाद निचले इलाकों में चले जाते हैं।' उन्होंने बताया कि गांव में होमस्टे बन जाने से उन्हें अतिरिक्त आय होने लगी है। 3 हजार जनसंख्या कालापानी इलाके के तीनों गावों की जनसंख्या तीन हजार है। नाबियाल ने बताया कि गांव के लोगों की आय का प्रमुख स्रोत इंडो-चीन सीमा व्यापार है, जो लिपुलेख दर्रे से होता है। यहां के लोग दुर्लभ-जड़ी बूटियां बेचते हैं जो उनका परिवार मिलकर पूरे साल इकट्ठा करता है। कोरोना महामारी के चलते 1 जून से 31 अक्टूबर तक चलने वाले इस व्यापार सीजन को बंद रखने का निर्देश दिया गया है। फिलहाल, 372 वर्गकिमी क्षेत्र में फैला कालापानी आईटीबीपी के जवानों के नियंत्रण में है। भारत का दावा है कि यह इलाका उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले का इलाका है जबकि हाल ही में नेपाल ने अपने नए नक्शे में इसे अपनी सीमा के अंदर दिखाया था।
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