रविवार, 6 दिसंबर 2020

20 वर्षों में उत्तराखंड ने खोया 50 हजार हेक्टेयर वन्य भूमि क्षेत्र, यह डेटा देखकर हो जाएंगे हैरान

देहरादून भारत की प्रमुख नदियों जैसे कि गंगा और यमुना का उद्गम स्थल उत्तराखंड (Uttarakhand Latest News) कमर्शल ऐक्टिविटीज के चलते अपना वन्य क्षेत्र तेजी से खोता जा रहा है। हमारे सहयोगी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया को वन विभाग से डेटा प्राप्त हुआ, जिसमें इस बात का पता चला कि राज्य में लगभग 70 फीसदी से ज्यादा वन्य भूमि है। इसमें से लगभग 50 हजार हेक्टेयर जमीन, जिसमें वन्य क्षेत्र हुआ करता था, वह पिछले 20 वर्षों में विकास कार्यों के नाम पर खत्म किया जा चुका है। राज्य की तकरीबन 21 हजार 207 हेक्टेयर वन्य भूमि का इस्तेमाल छह प्रमुख गतिविधियों के लिए किया गया। इसमें खनन, हाइड्रोपॉवर प्लांट्स, सड़क निर्माण, वॉटर पाइपलाइन, सिंचाई शामिल है। इसमें अधिकांश वन्य भूमि (8,760 हेक्टेयर) खनन के चलते खत्म हो गई, सड़क निर्माण के नाम पर 7,539 हेक्टेयर वन्य भूमि को खत्म किया गया। विद्युत वितरण लाइन बिछाने में 2,332 हेक्टेयर वन्य भूमि का इस्तेमाल हुआ जबकि 2,295 हेक्टेयर वन्य भूमि का प्रयोग हाइड्रो पॉवर प्लांट प्रॉजेक्ट के नाम पर किया गया। जिलों के हिसाब से क्या है डेटा? अन्य छोटी गतिविधियों के नाम पर 20 हजार 998 हेक्टेयर वन्य क्षेत्र को खत्म किया गया। इसमें ऑप्टिकल फाइबर, रेलवे, डिफेंस, पुनर्वास के साथ-साथ कई इमारतों के निर्माण का कार्य भी शामिल है। अब अगर जिलों के हिसाब से विश्लेषण करें तो (नवंबर 2000 से मार्च 2020 तक) देहरादून ने (21,303 हेक्टेयर) सबसे ज्यादा वन्य क्षेत्र खोया है। इसके अलावा हरिद्वार में 6,826 हेक्टेयर, चमोली में 3,636 हेक्टेयर, टिहरी में 2,671 हेक्टेयर, पिथौरागढ़ का 2,451 हेक्टेयर वन्य क्षेत्र खत्म चुका है। इस पर गौर करना है जरूरी वन्य भूमि का कमर्शल गतिविधियों के लिए इस्तेमाल तब और भी गौर करने वाला है जब फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (इंडिया स्टेट फॉरेस्ट रिपोर्ट 2019) की रिपोर्ट हाल ही में आई है। इसमें साफ दर्शाया गया है कि तीन जिलों- नैनीताल, उधमसिंह नगर और हरिद्वार के वन्य क्षेत्र में नेगेटिव ग्रोथ जारी है। वर्ष 2017 से 2019 के बीच यह क्रमश: -6.4 प्रतिशत, -4.2 प्रतिशत और -2.7 प्रतिशत है।


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