देहरादून उत्तराखंड में पिछले कुछ दिन से चल रही राजनीतिक उथल-पुथल का दौर थम गया है। खांटी भाजपाई राज्य के अगले मुख्यमंत्री होंगे। वह फिलहाल पौड़ी लोकसभा सीट से सांसद हैं। सीएम बनने के बाद उन्हें लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा देना पड़ेगा। 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने पौड़ी सीट से पूर्व मुख्यमंत्री के बेटे मनीष खंडूरी (कांग्रेस) को हराया था। का रिश्ता दशकों पुराना है। रावत, खंडूरी को अपना राजनीतिक गुरु मानते हैं। साल 1991 में बीसी खंडूरी को बीजेपी ने गढ़वाल सीट से टिकट दिया था। रावत उस वक्त अखिल भारतीय विद्याथी परिषद (ABVP) के राष्ट्रीय मंत्री थे। चुनाव के वक्त रावत ने खंडूरी को जिताने के लिए खूब मेहनत की। परिचय हुआ, संपर्क बढ़ा और फिर दोनों की नजदीकियां बढ़ती गईं। रिश्तों में अहम मोड़ आया था 1996 के लोकसभा चुनाव में। खंडूरी की ढाल बन गए थे रावतउस समय तक उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने की मांग जोर पकड़ती जा रही थी। आंदोलनकारियों ने तय किया कि चुनावों में हिस्सा लेने वाले हर नेता का विरोध करेंगे। बीजेपी ने फिर से खंडूरी को उम्मीदवार बनाया। जब वो नामांकन करने गए तो आंदोलनकारियों ने हमला बोल दिया। ऐसे वक्त में तीरथ सिंह रावत ने अपनी परवाह न करते हुए खंडूरी को हर तरफ से बचाया। एक तरह से वो खंडूरी की ढाल बन गए। पूरा चुनाव रावत ने खंडूरी के साये की तरह निकाल दिया। यहीं से गुरु-शिष्य के रिश्ते की मजबूत नींव रखी गई। पढ़ें: 'मैं हार जाऊं चलेगा, तीरथ नहीं हारना चाहिए'तीरथ सिंह रावत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रचारक भी रहे हैं। 1997 में जब यूपी विधान परिषद के चुनावों की घोषणा हुई तो खंडूरी ने रावत को MLC बनाने की पैरवी की। पार्टी के भीतर खूब विरोध हुआ मगर खंडूरी अड़े रहे। एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, एक बैठक के दौरान खंडूरी ने बीजेपी कार्यकर्ताओं से कहा था कि 'मैं भले ही हार जाऊं लेकिन तीरथ नहीं हारना चाहिए।' खंडूरी उस समय लोकसभा चुनाव के उम्मीदवार थे। खंडूरी की नजदीकी का खूब फायदा मिलाजब उत्तराखंड अलग राज्य बना तो रावत सूबे के पहले शिक्षा मंत्री बने। उनके गुरु खंडूरी दो बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे हैं। जब संगठन पर उनकी पकड़ मजबूत थी तो 2012 में रावत को चौबट्टाखाल सीट से विधानसभा का टिकट मिला। रावत जीतकर विधायक बन गए। अगले ही साल उन्हें उत्तराखंड बीजेपी का अध्यक्ष भी बना दिया गया। दोनों का रिश्ता कितना गहरा है इसका अंदाजा इस बात से लगाएं कि बीसी खंडूरी पांच बार सांसद रहे हैं। इनमें से पांच बार उनके चुनाव संयोजन का जिम्मा तीरथ सिंह रावत ने संभाला।
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