इसके प्रवेशद्वार के दोनों ओर लगे साइनबोर्ड वहां आने वाले लोगों को पेडों को गले लगाने, घास पर नंगे पांव चलने, पीठ के बल लेटने और झूमते पेडों या आसमान को निहारने की सलाह देते हैं ।
पर्यटकों को ध्यान लगाने के लिए पूरे तौर पर प्राकृतिक माहौल उपलब्ध कराने के उददेश्य से वहां छोटे—छोटे लकडी के ढांचे ट्री प्लेटफार्म बनाए गए हैं ।
मुख्य वन संरक्षक संजीव चतुर्वेदी ने बताया कि उत्तराखंड वन विभाग की अनुसंधान शाखा ने वन स्नान की जापानी तकनीक—शिनरिन या योकू—से प्रेरणा लेते हुए इस चिकित्सा केंद्र को तैयार किया है ।
करीब 13 एकड से ज्यादा क्षेत्रफल में फैले इस वन चिकित्सा केंद्र का उदघाटन रानीखेत के प्रख्यात पर्यावरणविद जोगिंदन बिष्ट ने किया ।
चतुर्वेदी ने बताया कि यह पता चला है कि पेडों को गले लगाने से शरीर में अच्छे हार्मोन जैसे आक्सीटोसिन, सेराटोनिन और डोपामाइन का स्तर बढ जाता है ।
यह चिकित्सा केंद्र चीड की बहुतायत वाले जंगल में बनाया गया है क्योंकि विभिन्न अध्ययनों से पता चला है कि चीड जैसे वृक्ष विभिन्न बीमारी वाले प्राणियों से बचने के लिए कुछ तैलीय तत्व निकालते रहते हैं ।
विभिन्न शोधों में यह भी पाया गया है कि ये तत्व खून में नेचुरल किलर कोशिकाओं को बढा देते हैं जिससे संक्रमणों और कैंसर से लडने की तथा शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढती है ।
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