बुधवार, 10 मार्च 2021

चुनावी साल, ब्यूरोक्रेसी में मतभेद, सबकी संतुष्टि....नए सीएम तीरथ सिंह रावत को पार करना होगा 'आग का दरिया'

देहरादून उत्तराखंड में बीजेपी के राजनीतिक संकट के बाद अब सीएम पद की कमान संभालने वाले के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं। राजभवन में शपथ लेने के बाद तीरथ सिंह रावत के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार की है। इस फैसले में तीरथ सिंह रावत के सामने बीजेपी का अंतर्विरोध भी सामने है, जिसके कारण पिछले सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत को इस्तीफा देना पड़ा था। ऐसे में सीएम तीरथ को पहाड़ और मैदान के बीच एक कॉमन सहमति बनानी होगी, जिससे कि सरकार और पार्टी में सभी को संतुष्ट किया जा सके। बीजेपी के एक बड़े नेता का कहना है कि तीरथ सिंह रावत के लिए 2022 के चुनाव से पहले बीजेपी के हर धड़े को संतुष्ट करना एक बड़ी चुनौती होगा। पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत की सरकार में सतपाल महाराज, हरक सिंह रावत, यशपाल आर्या, सुबोध उनियाल और रेखा आर्य जैसे नेताओं को मंत्री बनाया गया था, जो कि कांग्रेस को छोड़कर बीजेपी में आए थे। उस वक्त त्रिवेंद्र ने सिर्फ 8 मंत्री बनाए थे, जबकि उनके पास 12 मंत्रियों को रखने का अधिकार था। लेकिन तमाम आंतरिक मतभेदों के कारण त्रिवेंद्र 4 साल तक अपनी कैबिनेट का विस्तार नहीं कर सके। पहाड़ी इलाकों में सामंजस्य बनाए रखना बड़ा चैलेंज उत्तराखंड के पहाड़ी हिस्से पौड़ी से ताल्लुक रखने वाले तीरथ सिंह रावत इस हिस्से की 30 सीटों पर मजबूत पकड़ वाले नेता कहे जाते हैं। इसके अलावा वह पूर्व सीएम भुवन चंद खंडूरी के करीबी भी रहे हैं। उनके सामने एक बड़ी चुनौती ये भी है कि उन्हें अपने क्षेत्र, पार्टी और ब्यूरोक्रेसी के बीच मजबूत सामंजस्य बनाना होगा। वहीं चुनावी साल में तीरथ सिंह रावत के सामने विकास कार्यों को भी पूरा करना सबसे बड़ी चुनौती है। चुनावी साल में समन्वय सबसे बड़ी चुनौती बीजेपी के करीबी लोगों का यह कहना है कि आने वाले चुनावों में तीरथ सिंह रावत की स्वीकार्य छवि का लाभ तो उनकी पार्टी को मिल सकता है, लेकिन उनके सामने चुनौती इस बात की भी होगी कि वो सारा प्रबंधन ठीक तरीके से कर सकें। एक और बड़े बीजेपी नेता का यह भी कहना है कि अगर रावत तराई के इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत कर पाते हैं तो अगले वर्ष होने वाले चुनाव में उन्हें बड़ा लाभ हो सकता है। इसके अलावा बीजेपी के संगठन में उनकी मजबूत पकड़ भी उन्हें सियासी माइलेज दे सकती है।


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