राज्य में वर्ष 2016 में हरीश रावत सरकार के खिलाफ विद्रोह के कारण कई प्रमुख नेताओं के कांग्रेस छोड़ने के बाद से कांग्रेस बड़े नेताओं की कमी के संकट से जूझ रही थी। गढ़वाल के प्रमुख नेता हरक सिंह शुक्रवार को दोबारा कांग्रेस में शामिल हो गए, जबकि कुमाऊं के बड़े दलित नेता आर्य अपने विधायक पुत्र संजीव के साथ पिछले साल अक्तूबर में ही कांग्रेस में वापस आ गए थ। राव और आर्य, दोनों ही अनुभवी नेता हैं इसलिए इनकी वापसी को कांग्रेस की ताकत में अहम बढ़ोतरी के रूप में देखा जा रहा है। प्रदेश कांग्रेस महासचिव मथुरा दत्त जोशी ने कहा, ‘‘दोनों दशकों का अनुभव रखने वाले कद्दावर राजनेता हैं, पार्टी में इनके फिर से शामिल होने से निश्चित रूप से कांग्रेस की संभावनाएं और उज्ज्वल होंगी।’’
रावत की सबसे खास बात यह है कि वर्ष 2000 में उत्तराखंड के बाद से उन्होंने चार अलग-अलग स्थानों से चार विधानसभा चुनाव लड़ा, लेकिन कभी हार का मुंह नहीं देखा। रावत अविभाजित उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सरकार में मंत्री रह चुके हैं। इसी तरह आर्य भी उत्तराखंड विधानसभा अध्यक्ष, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में कार्य कर चुके हैं। उत्तराखंड की विजय बहुगुणा और हरीश रावत के नेतृत्व वाली दोनों सरकार में आर्य मंत्री रहे।
आर्य उत्तराखंड की अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित 12 सीट पर निर्णायक भूमिका निभाने में सक्षम हैं, क्योंकि उन्हें राज्य में सबसे बड़े दलित नेता के रूप में देखा जाता है। आर्य की उपस्थिति जिन सुरक्षित सीटों पर कांग्रेस की संभावनाएं बढ़ाएगी उनमें शामिल हैं- पुरोला, हराली, घनशाली, राजपुर रोड, ज्वालापुर, भगवानपुर, पौड़ी, गंगलीहाट, बागेश्वर, सोमेश्वर, नैनीताल और बाजपुर। आर्य ने वर्ष 2017 का विधानसभा चुनाव भाजपा के टिकट पर 54 हजार से अधिक मतों से जीता था।
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