देहरादून उत्तराखंड में बीजेपी को चुनावी वर्ष में मुख्यमंत्री बदलना पड़ा। उसके बाद भी वहां सब कुछ उसके अनुकूल होता नहीं दिख रहा है। खुद को सहज नहीं कर पा रहे हैं। उधर नए मुख्यमंत्री जिस तरह से उनके फैसलों को पलट रहे हैं, उसे देखते हुए कहा जा रहा है कि बीजेपी प्रदेश में अपने पिछले चार साल को याद नहीं रखना चाहती। उत्तराखंड में चल रही उठापटक पर पार्टी नेतृत्व का क्या दृष्ठिकोण है, यह जानने के लिए एनबीटी के नैशनल पॉलिटिकल एडिटर नदीम ने बात की उत्तराखंड के बीजेपी प्रभारी दुष्यंत कुमार गौतम से। प्रस्तुत हैं बातचीत के मुख्य अंश: क्या आपको लगता है कि उत्तराखंड में बीजेपी के अंदर सब कुछ ठीक चल रहा है? मुझे तो कहीं कोई गड़बड़ी नजर नहीं आती। संगठन प्रभावी है। सरकार बेहतर प्रदर्शन कर रही है। पांच साल का कार्यकाल पूरा होने जा रहा है। अगले साल जब चुनाव होगा तो मुझे यकीन है कि फिर हमारी सरकार बनेगी। अगर सब कुछ इतना ही अच्छा चल रहा था तो चुनावी वर्ष में मुख्यमंत्री बदलने की जरूरत क्यों पड़ गई? यह बीजेपी है, यहां यह पहले से तय नहीं होता कि अमुक व्यक्ति अमुक घराने से है, इसलिए वही मुख्यमंत्री बनेगा और जब तक जिंदा रहेगा, वही मुख्यमंत्री रहेगा। बीजेपी में वक्त के अनुसार कार्यकर्ताओं की भूमिका बदलती रहती है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने जब तक चाहा त्रिवेंद्र सिंह रावत का उपयोग मुख्यमंत्री के रूप में किया, फिर उनकी भूमिका को लेकर कुछ और सोचा होगा तो उनके स्थान पर तीरथ सिंह रावत को बिठा दिया। इन सबका आशय यह नहीं कि बीजेपी के अंदर कुछ गड़बड़ है। त्रिवेंद्र सिंह रावत हर बयान में यही कह रहे हैं कि उन्हें नहीं पता क्यों हटाया गया। क्या यह स्थितियों के सामान्य होने का संकेत है? जरूरी नहीं कि हर वजह हर किसी को मालूम ही हो। केंद्रीय नेतृत्व का फैसला सभी को मान्य होता है। उसमें किंतु-परंतु जैसा कुछ नहीं होता। पार्टी जब किसी व्यक्ति को किसी पद पर नियुक्त करती है तो क्या उसकी वजह सबको बताई जाती है? पार्टी नेतृत्व समय और परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेता रहता है, यह उसका काम है। त्रिवेंद्र सिंह रावत ने पिछले दिनों एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कहा कि अभिमन्यु का वध छल से हुआ था और तब द्रौपदी ने रोने धोने के बजाय उसका प्रतिशोध लेने को कहा था। उनके इस कथन के पीछे कुछ छुपा-छुपा सा नहीं दिख रहा क्या? उनकी पीड़ा स्वाभाविक हो सकती है। मानव मन है, वह विचलित भी होगा लेकिन जैसा मैंने पहले भी कहा कि बीजेपी में व्यक्तिगत इच्छा कोई मायने नहीं रखती। रही बात समर्थकों को गोलबंद करने की तो त्रिवेंद्र सिंह रावत जैसे कर्मठ और निष्ठावान कार्यकर्ता के पार्टी की नीतियों और रीतियों से विपरीत जाने की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। वैसे बीजेपी में कार्यकर्ता किसी व्यक्ति का नहीं होता है, वह पार्टी का होता है। तीरथ सिंह रावत ने उनके कई फैसले पलट दिए, इसे क्या माना जाए? कोई फैसला लिया गया तो ऐसा तो है नहीं कि वह पत्थर की लकीर हो गया, उसे पलटा नहीं जा सकता। त्रिवेंद्र सिंह रावत ने जो फैसले किए थे, वह उनके व्यक्तिगत फैसले नहीं थे, वह भी बीजेपी सरकार के फैसले थे। उनकी कैबिनेट ने उस समय की परिस्थितियों के अनुसार अपने विवेक से लिए थे अब अगर तीरथ सिंह रावत उन फैसलों में कुछ बदलाव कर रहे हैं तो वह तीरथ सिंह रावत का फैसला नहीं है, वह भी बीजेपी सरकार का है। मौजूदा कैबिनेट वर्तमान परिस्थितियों के मद्देनजर अपने विवेक से फैसले ले रही है। यह तो अच्छी बात है। त्रिवेंद्र सिंह रावत ने जिन लोगों को दर्जा प्राप्त मंत्री बना रखा था, उन्हें भी हटा दिया गया। कहा जा रहा है कि वे उनके भरोसेमंद लोग थे, इसलिए तीरथ सिंह रावत को पसंद नहीं थे... यह भी एक सामान्य प्रक्रिया है। जब एक मुख्यमंत्री हटता है तो उसकी कैबिनेट के भी मंत्री हट जाते हैं। ये तो दर्जा प्राप्त मंत्री थे। नई सरकार में फिर से मनोनयन होता है। इसमें कोई अस्वाभाविक चीज नहीं है। बीजेपी का इतिहास है कि जब भी कोई मुख्यमंत्री हटाया गया है, वह चाहे केशुभाई पटेल हों, कल्याण सिंह या उमाभारती, देर सबेरे सभी बागी हुए हैं, त्रिवेंद्र सिंह रावत भी क्या उसी राह पर कदम बढ़ा सकते हैं? आप जो उदाहरण दे रहे हैं, वह अधूरा इतिहास है। पूरा इतिहास यह है कि इन लोगों को अंतत: फिर से बीजेपी में आना पड़ा। चुनाव में पार्टी किसकी उपलब्धियां लेकर जनता के बीच जाएगी त्रिवेंद्र सिंह रावत की या फिर तीरथ सिंह रावत की? हम पांच साल की बीजेपी सरकार के कामकाज को लेकर जाएंगे। पांच साल के दरम्यान उत्तराखंड में बीजेपी सरकार ने उल्लेखनीय काम किए हैं, जिसपर पार्टी गर्व कर सकती है। उत्तराखंड में विपक्ष नाम की कोई चीज ही नहीं है। हमारी सरकार ने इतना अच्छा काम किया कि उसके हाथ कोई मुद्दा ही नहीं लगा, जिससे उसे धार मिल सके।
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