देहरादून उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में बस चंद महीने का वक्त बचा है लेकिन सत्तारूढ़ दल बीजेपी की चुनौतियां बढ़ती ही जा रही है। छह महीने में तीन मुख्यमंत्री बदलने के बाद भी देवभूमि में बीजेपी पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। सोमवार को उत्तराखंड बीजेपी को बड़ा झटका कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य के रूप में लगा जिन्होंने पार्टी से इस्तीफा देकर कांग्रेस जॉइन कर ली। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यशपाल आर्य की घरवापसी से जहां कांग्रेस को संजीवनी मिल गई है वहीं बीजेपी के लिए यह बहुत भारी नुकसान है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या अब पुष्कर सिंह धामी से भी पहाड़ी राज्य नहीं संभल पा रहा है? यशपाल आर्य अपने बेटे और नैनीताल से विधायक संजीव आर्य के साथ सोमवार को कांग्रेस में शामिल हुए। यशपाल आर्य बाजपुर से 6 बार के विधायक हैं जो कि उधम सिंह नगर में आता है। वह तराई क्षेत्र के प्रभावशाली दलित नेता भी हैं। पुष्कर सिंह धामी सरकार में वह परिवहन मंत्री थे। सूत्रों के अनुसार, धामी को सीएम बनाए जाने से यशपाल आर्य खुश नहीं थे। बीजेपी की तरफ से उन्हें मनाने की कोशिश की गई। यहां तक कि पुष्कर सिंह धामी खुद 25 सितंबर को मान-मुनौव्वल के लिए पुष्कर सिंह धामी आवास गए थे। किसानों की नाराजगी है बीजेपी छोड़ने की वजह? हालांकि यशपाल के बीजेपी छोड़ने की एक दूसरी खास वजह भी है। बीजेपी में 5 साल रहने के बाद दलित नेता यशपाल आर्य की कांग्रेस में वापसी किसान आंदोलन और चुनावों पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर सत्तारूढ़ दल में बेचैनी का संकेत भी बताया जा रहा है। आर्य बाजपुर का नेतृत्व करते हैं जहां 85 फीसदी आबादी किसानों की है और उनमें भी एक बड़ा भाग सिख समुदाय से है। सूत्रों के अनुसार, यशपाल आर्य को मंत्री रहते हुए कुछ अवसरों पर किसानों का विरोध झेलना पड़ा था और वह बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ने से कतरा रहे थे। कांग्रेस में शामिल होने के साथ उन्हें अपने क्षेत्र में फीसदी मुस्लिम आबादी का समर्थन हासिल करने में भी मदद मिल सकती है। किसान आंदोलन से हो सकता है बीजेपी को नुकसान? चुनाव रणनीतिकारों का कहना है कि किसान आंदोलन के चलते उत्तराखंड में सत्ता के खिलाफ लहर तेज है खासकर तराई क्षेत्र में जो कि यशपाल आर्य का गढ़ माना जाता है। उत्तराखंड के तराई क्षेत्र में उधम सिंह नगर और नैनीताल का मैदानी इलाका आता है। यहां सिख किसानों की बड़ी आबादी है। उद्धम सिंह नगर में किसानों का बड़ा वोटरबेस है और लखीमपुर खीरी घटना ने सत्ताधारी दल के नेताओं के लिए हालात बेहद अजीब कर दिए हैं। किसानों की नाराजगी दूर करने के लिए पिछले दिनों बीजेपी ने उत्तराखंड में तीन महत्वपूर्ण पद- गवर्नर, मुख्य सचिव और अल्पसंख्यक आयोग के मुखिया में सिख समुदाय के सदस्य को नियुक्त किया था। इसके अलावा दिल्ली के सिख विधायक आरपी सिंह को उत्तराखंड के सह चुनाव प्रभारी बनाया गया था। कौन हैं यशपाल आर्य? आर्य ने अपना पहला चुनाव 1989 में खटीमा सीट से जीता था, जहां से फिलहाल सीएम पुष्कर सिंह धामी विधायक हैं। 1993 के चुनाव में दोबारा आर्य ने इसी सीट पर बाजी मारी थी। उत्तराखंड के अलग राज्य बनने के बाद 2002 और 2007 में आर्य ने मुक्तेश्वर सीट से चुनाव लड़कर जीत हासिल की थी। फिर 2012 में उन्होंने बाजपुर सीट का प्रतिनिधित्व किया और 2017 में बीजेपी के टिकट पर दोबारा विधायक बने। यशपाल से कांग्रेस को कितनी मदद? उत्तराखंड की राजनीति में यशपाल आर्य बड़ा दलित चेहरा होने के साथ ही तराई क्षेत्र की तकरीबन आधा दर्जन से अधिक सीटों पर प्रभाव रखते हैं। वहीं दूसरी ओर यह भी कहा जा रहा है कि आर्य को अपने पाले में खींचकर कांग्रेस पंजाब वाला फॉर्म्युला यहां भी अप्लाइ कर सकती है। इसके पीछे पूर्व सीएम हरीश रावत का वह बयान है जिसमें उन्होंने कहा था कि वह राज्य के सीएम पद की कुर्सी पर किसी दलित को बैठे देखना चाहते हैं। आर्य की मदद से कांग्रेस सिर्फ देवभूमि ही नहीं बल्कि पूरे यूपी के दलित वोटों पर भी सेंधमारी कर सकती है।
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