मंगलवार, 8 सितंबर 2020

India-China Clash: चीन सीमा पर मजबूत है भारत की तैयारी, 1962 से 100 गुना बेहतर स्थिति में है सेना

पिथौरागढ उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में चीन के साथ लगती सीमाओं पर भारत का बुनियादी ढांचा साल 1962 में हुए युद्ध के समय के मुकाबले काफी बेहतर है। यहां अधिकारियों और रक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि सैन्य ढांचागत सुविधाएं 1962 के जमाने के मुकाबले इस समय सौ गुना बेहतर हैं क्योंकि अब न केवल सीमा तक सड़कें बन गई हैं बल्कि हवाई संपर्क भी बहुत मजबूत हुआ है। हर तरह के हेलिकॉप्टर सीमा के नजदीक दारमा, व्यास और जौहार घाटियों तक उतरने लगे हैं। धारचूला में एक अधिकारी ने कहा, 'क्षेत्र में तीन महत्वपूर्ण सीमा सड़कों में से लिपुलेख दर्रे तक की सड़क पूरी हो चुकी है। दारमा घाटी में सीमा चौकी तक जाने वाली सड़क पूरी होने के नजदीक है जबकि जौहार घाटी में सीमा सड़क का केवल एक छोटा सा हिस्सा ही पूरा होना बाकी है।' उन्होंने बताया कि मुनस्यारी से मिलम तक 55 किमी लंबी निर्माणाधीन सड़क भी अगले साल तक बन जाने की संभावना है। बुनियादी सुविधाओं के निर्माण में तेजी सीमा सड़क संगठन के मुख्य अभियंता विमल गोस्वामी ने बताया, 'सड़क का ज्यादातर हिस्सा बन चुका है और उस पर लोगों के वाहन चल रहे हैं।' रक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञों के अनुसार, भारत सरकार हाल में चीनी इरादों को भांपते हुए भारत-चीन सीमा पर सैन्य ढांचागत सुविधाओं के निर्माण में तेजी लाई है। कारगिल युद्ध के समय सेना के प्रवक्ता रहे लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त्) एमसी भंडारी ने कहा, 'हमने अगर चीनी खतरे को पहले ही भांप लिया होता तो हम सीमा पर सैन्य ढांचागत सुविधाओं के मामले में बेहतर रूप से तैयार होते।' ग्रामीणों का मनोबल भी आसमान में भारत-चीन सीमा पर हवाई संपर्क को साल 1962 के मुकाबले सौ गुना बेहतर बताते हुए भंडारी ने कहा कि अब हम दारमा, व्यास और जौहार घाटी जैसे सीमा क्षेत्रों में हर तरह के हेलिकॉप्टर उतार सकते हैं और अपनी सेना को मदद पहुंचा सकते हैं। सीमा पर हवाई संपर्क बेहतर होने से सेना का हौसला बढ़ने के अलावा सीमावर्ती गांवों में रहने वाले लोगों का मनोबल भी उंचा हुआ है। खच्चरों-भेड़ों पर पहुंचाए गोला-बारूद व्यास घाटी के नपलचू गांव के रहने वाले 80 वर्षीय गोपाल सिंह नपलच्याल ने बताया, 'हममें अपने देश और उसके सैन्य बलों के प्रति एक मजबूत समर्पण है। 1962 में जब चीनी सैन्य बल इन घाटियों में सीमा के पास तक पहुंच गए तब हम गांव वालों ने खच्चरों और भेड़ों पर गोला-बारूद और खाना लादकर उन्हें सीमा चौकियों तक पहुंचाकर अपनी सेना की मदद की।' उन्होंने बताया कि इसके लिए वे युद्ध समाप्त होने तक गांवों में ही डटे रहे और निचले इलाकों में नहीं आए। महिलाओं ने दान किए गहने नपलच्याल ने बताया कि उनकी महिलाओं ने देश की मदद के लिए अपने सोने और चांदी के गहने तक दे दिए। जौहार घाटी के ग्रामीणों का कहना है कि दिवंगत लक्ष्मण सिंह जंगपांगी उनके प्रेरणास्रोत हैं जिन्हें तिब्बत के गारतोक शहर में भारतीय व्यापार एजेंट के रूप में काम करने के दौरान देश के लिए किए गए कार्यों हेतु 1959 में पदमश्री से अलंकृत किया गया था। ऊपरी जौहार घाटी के निवासी श्रीराम धर्मशक्तु ने बताया कि वह पहले भारतीय थे जिन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को भारतीय भूक्षेत्रों पर चीन के बुरे इरादों के बारे में बताया था।


from Uttarakhand News in Hindi, Uttarakhand News, उत्तराखंड समाचार, उत्तराखंड खबरें| Navbharat Times https://ift.tt/2R4lw7I

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें