मंगलवार, 14 जुलाई 2015

मेरे क़ाबू में न... मेरे क़ाबू में न पहरों दिल-ए-नाशाद आया; वो मेरा भूलने वाला जो मुझे याद आया; दी मुअज्जिन ने शब-ए-वस्ल अज़ान पिछली रात; हाए कम-बख्त के किस वक्त ख़ुदा याद आया; लीजिए सुनिए अब अफ़साना-ए-फुर्कत मुझ से; आप ने याद दिलाया तो मुझे याद आया; आप की महिफ़ल में सभी कुछ है मगर 'दाग़' नहीं' मुझ को वो ख़ाना-ख़राब आज बहुत याद आया।

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